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चरित्र की शुरुआत

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहा जो लबों से, वो बस एक इबारत निकली,
        
                                                    
                            
जो दिल में रही, वही असली शरारत निकली।

हर सच को बाज़ार में सजाना मुनासिब कब था,
कुछ ख़ामोशियाँ ही इंसान की दौलत निकली।

जिसे सुनकर भी कोई आवाज़ सुनाई न दे,
वही रूह की सबसे वजनी इबादत निकली।

हम चाहकर भी कई बार मुकम्मल न बोल सके,
ज़ुबाँ हार गई, मगर नीयत सलामत निकली।

रिश्ते बचाने हों तो हर बात कही नहीं जाती,
कई बार चुप्पी ही सबसे बड़ी हिकमत निकली।

जो जीत के लिए हर हद से गुज़र जाते हैं,
उनसे बेहतर तो मर्यादा में मिली शिकस्त निकली।

दिल में हज़ारों शिकवे थे, लब तक एक भी न आया,
हमारी ख़ामोशी ही हमारी शराफ़त निकली।

याद रखना...
अल्फ़ाज़ इंसान की पहचान ज़रूर होते हैं,
मगर उसका क़द नहीं बताते।
क़द तो तब मालूम होता है,
जब सच सामने हो, लफ़्ज़ मौजूद हों,
मगर इंसान अपनी मर्यादा के लिए
उन्हें अपने ही सीने में दफ़्न कर दे।

वहीं से चरित्र की शुरुआत होती है,
और वहीं इंसान, सिर्फ़ बोलने वाला नहीं,
बल्कि सहने वाला कहलाता है।

किसी ने शब्दों में क्या पिरोया है, नीचे देखिए…
जो कह दिया, वो शब्द थे,
जो नहीं कह सके, वो अनुभूति थी,
और जो कहना है, मगर कह नहीं सकते, वो मर्यादा है।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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