विज्ञापन

भीतर शोर बहुत है

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दीवारों से फ़र्श अड़ी है, खिड़की कहाँ से खोलें,
        
                                                    
                            
बंद पड़े इस कमरे में अब साँस कहाँ से अब लें।
जागती आँखें सोच रही हैं, नींद कहाँ से लाएँ,
मन के भीतर शोर बहुत है, किससे जाकर कह आएँ।

क्या कुछ टूटा, क्या कुछ छूटा… राज़ समझ न आए,
दिल चुप है पर भीतर जाने कितने नग़मे घोले।
सोच की गलियाँ भाग रही हैं, कोई मोड़ न आए,
खुद से पूछें लाख दफ़ा, जवाब मगर न पाए।

रात खड़ी है सामने और सुबह का पता नहीं,
मन में इतना कुछ जमा है, पर कहने को शब्द नहीं।
शायद कोई बात अधूरी अब भी भीतर ठहरी है,
इसीलिए तो आँख खुली है और नींद हमसे रूठी है।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all