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बनजारों की एक यादगार चाय

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरा शीतल मन क्यों रूठ गया है?
        
                                                    
                            
चलो, तुम्हें बंजारों की खूब पकाई गई चाय पिलवाता हूँ।
स्कूल के आगे जो पहाड़ी है,
उसी की तलहटी में एक बंजारों की बस्ती है।
अगले मोड़ पर वहीं उनका छोटा-सा चाय का ढाबा है।
एक बार श्रीकांत के साथ लौटते हुए वहाँ चाय पी थी...

वो मुस्कुराई भी नहीं।
बस इतना बोली…
"चाय से भी कहीं मन बदलता है क्या?"

मैंने कहा…
"हर चाय में नहीं,
कुछ चायों में रास्तों की लंबी कहानी घुली होती है,
कुछ में मेहनत की आँच,
और कुछ में बरसों का अपनापन।
आज तुम्हें ऐसी ही चाय पिलाने ले चल रहा हूँ |”

हम दोनों धीरे-धीरे उस पगडंडी पर चल पड़े।
स्कूल की घंटी अब बंद हो चुकी थी।
बच्चों की आवाज़ें,
हवा के साथ कहीं, दूर निकल गई थीं।
पहाड़ी के नीचे पहुँचते ही,
जलती लकड़ियों के धुएँ की, महक आने लगी।
वहाँ सचमुच,
एक छोटा-सा ढाबा था।
मिट्टी की दीवारें,
टीन की छत,
और चूल्हे पर चढ़ी एक काली केतली...

बंजारा बूढ़ा,
बिना किसी जल्दबाज़ी के,
चाय को खौलाए जा रहा था।
मैंने पूछा…
"बाबा, इतनी देर क्यों उबालते हो?"
वो मुस्कुराया।
और बोला…
"बेटा,
जल्दी में बनी चाय,
बस प्यास बुझाती है,
धीरे-धीरे पकी चाय,
थकान उतारती है।"

इतना कहकर उसने,
अदरक को सिलबट्टे पर कूटा।
इलायची के दो दाने डाले।
फिर चम्मच से चाय को,
इतनी देर तक चलाता रहा,
कि उसका रंग सचमुच,
सुर्ख़ लालिमा लिए हुए दिखाई देने लगा।

वो मेरी ओर देखकर बोली…
"इतनी देर में तो शहर वाले,
दस कप चाय बेच देते।"
बंजारा हँस पड़ा।
"हम चाय नहीं बेचते बिटिया,
हम तो थोड़ा-सा सुकून परोसते हैं।"

उसकी यह बात सुनकर,
हम दोनों चुप हो गए।
कुछ ही देर में,
दो कुल्हड़ हमारे सामने थे।
पहला घूँट लेते ही,
उसने आँखें बंद कर लीं।

मैंने पूछा…
"कैसी लगी?"
वो बोली…
"अदरक गले से नहीं,
सीधे मन तक उतर रही है।"
मैंने हँसकर कहा…
"इसीलिए तो लाया था।
कुछ जगहें स्वाद नहीं देतीं,
यादें बना देती हैं।"

चाय खत्म होने तक,
उसके चेहरे की उदासी,
धीरे-धीरे भाप बनकर उड़ चुकी थी।
चलते-चलते उसने पूछा…
"तुम्हें कैसे पता था,
कि मेरा मन यहीं आकर ठीक हो जाएगा?"
मैंने पहाड़ी की ओर देखते हुए कहा…

"क्योंकि मैंने उस दिन,
श्रीकांत के साथ सिर्फ़ चाय नहीं पी थी...
मैंने सीखा था कि,
जो चीज़ धीमी आँच पर पकती है,
उसमें गहराई अपने आप उतर आती है।
चाहे वो चाय हो,
रिश्ता हो,
या इंसान का स्वभाव।"

हम वापस लौटने लगे।
सूरज पहाड़ी के पीछे उतर रहा था।
ढाबे के चूल्हे से उठता धुआँ,
आसमान में ऐसे घुल रहा था,
जैसे कोई पुरानी दास्तान,
फिर से सुनाई जा रही हो।

मैंने आख़िर में उससे कहा…
"जब भी मन रूठ जाए,
किसी महँगे कैफ़े की चमक मत ढूँढ़ना।
किसी मिट्टी के चूल्हे पर,
धीमी आँच में पकती चाय तक चले आना।
वहाँ चीनी से ज़्यादा मिठास,
अदरक से ज़्यादा गर्माहट,
और दूध से ज़्यादा अपनापन मिलेगा।
ज़िंदगी की सबसे यादगार चाय,
वो नहीं होती जो पाँच मिनट में बन जाए,
वो होती है, जो धैर्य की आँच पर, इतनी देर खौले,
कि उसकी हर चुस्की यह याद दिला दे…
सच्चे स्वाद और सच्चे रिश्ते,
दोनों कभी जल्दबाज़ी में पैदा नहीं होते।"
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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