एक दोपहरी का किस्सा लकी के साथ का…
घर के पीछे,
अपने ही खाली प्लॉट पर,
कुछ साल पहले…
काले शहतूत का एक पेड़ था।
मौसम आता तो उसकी हर डाल,
बैंगनी-काले मोतियों से भर जाती,
मानो धरती ने आसमान के कुछ तारे,
अपने आँचल में छिपा लिए हों।
एक दिन ललक हुई,
एक शहतूत तोड़कर मुँह में रखा।
पहले हल्की-सी खटास मिली,
फिर मिठास धीरे-धीरे घुलने लगी।
ऐसा स्वाद,
जो बाज़ार की किसी मिठाई में नहीं,
सिर्फ़ पेड़ की शाखों पर फलता है।
फिर क्या था...
बचपन ने शरारत को इजाज़त दे दी।
डाल को दोनों हाथों से पकड़कर,
ज़ोर से हिला दिया।
टप... टप... टप...
देखते ही देखते,
ढेर सारे शहतूत नीचे बिछाए तौलिये पर,
बरसात की बूँदों की तरह गिरने लगे।
हम सब दोस्त,
ऐसे टूट पड़े उन पर,
जैसे कोई ख़ज़ाना मिल गया हो।
किसी की हथेलियाँ बैंगनी थीं,
किसी के होंठ रंग गए थे,
किसी की हँसी में शहतूत का रस था,
तो किसी की शर्ट पर,
बचपन के दाग़ लग गए थे।
फिर शुरू हुई वही पुरानी नोकझोंक…
"ये वाला मेरा है…"
"अरे, वो बड़ा वाला मत उठाना…"
और जो सबसे ऊँची डाल पर बच गए थे,
उन्हें पाने के लिए,
हम सब अपनी-अपनी तरकीबें आज़मा रहे थे।
पेड़ भी शायद मुस्कुरा रहा था,
उसे मालूम था कि,
उसके फल सिर्फ़ पेट नहीं,
यादें भी भर रहे हैं।
शाम ढली,
तौलिया लगभग खाली हो चुका था।
लेकिन ज़मीन पर गिरे कुछ शहतूत
चींटियों और चिड़ियों के हिस्से भी छोड़ दिए थे।
तब कौन जानता था कि,
खुशियाँ बाँटने का पहला सबक,
कोई किताब नहीं,
एक शहतूत का पेड़ पढ़ा रहा था।
आज उस जगह,
न पेड़ है, न तौलिया बिछती है,
न दोस्तों की वैसी टोली जुटती है।
लेकिन जब भी कहीं,
काला शहतूत दिखाई देता है,
उँगलियों पर वही बैंगनी रंग लौट आता है,
और मन फिर उसी खाली प्लॉट में पहुँच जाता है,
जहाँ दौलत ज़मीन के काग़ज़ों में नहीं,
पेड़ों की शाखों पर लटकती थी।
शायद बचपन की सबसे बड़ी अमीरी,
यही थी…
एक पेड़ अपना था,
दोस्त अपने थे,
और वक़्त इतना अपना था,
कि एक डाल हिलाकर…
पूरी दोपहर हँसी से भर जाती थी।
-रतन कुमार कैथवास