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आखिर कैसे मुस्कुराओगे

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कब तक घिस-घिस अपने को चंदन बनाओगी,
        
                                                    
                            
कब तक यूँ ही अपने मन की बातें छुपाओगी।

कुछ तो सोचो, मेरे बिना तेरा क्या होगा,
सूनी राहों में फिर किसका इंतज़ार होगा।

मैं जो न रहूँ तो किससे आँखें मिलाओगी,
किसके नाम की मेहँदी हाथों में रचाओगी।

किसके लिए सोलह शृंगार सजाओगी,
किसके आने पर पायल की रुनझुन सुनाओगी।

मेरी बातों पर यूँ ही रूठा करो तुम,
तभी तो कुछ मनाया करूँगा तुम्हें |

तुम चंदन बनोगी तो मैं खुशबू बन जाऊँगा,
तुम धूप बनोगी तो मैं बादल बन छा जाऊँगा।

तुम चाहे जितना मुझसे नज़रें चुराओगी,
आख़िर एक दिन मेरी याद में लौटकर आओगी।

ये दिल्लगी कोई खेल नहीं जो यूँ ही छोड़ दोगी,
दिल की किताब खोलोगी तो मेरा नाम ही पढ़ोगी।

कब तक घिस-घिस अपने को चंदन बनाओगी,
कुछ तो सोचो… मेरे बिना आख़िर कैसे मुस्कुराओगी।
-रतन कुमार कैथवास
6 दिन पहले
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