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स्वीकार है आवारा है

rashmi gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ सदमों को स्वीकारा है
        
                                                    
                            
जिंदगी को कुछ इस तरह संवारा है
इंतहा हो या इम्तिहा हों
सबको हमने नक्कारा है
आवाज देते हैं जब आसमान
बारिश बूंदे चिल्लाती है
बंद कमरों से हमारी लगी लगन
हमने कभी किसी को भी पुकारा है
रहते है हम खोए खोए
राह में कांटों को पिरोए
हमने अपनी ख्वाहिशों को ललकारा है
क्या हम, क्या दुनियादारी
सबकी दस्तक को दुत्कारा है
हां हमनी मौन को स्वीकार किया
ठंडी रातों से प्यार किया
आवाज किसी को दिया नहीं
बस कल की याद ने मारा है
हां मैं खुल कह सकती हूं
"हां", मेरा दिल आज भी आवारा है
एक वर्ष पहले
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Shivam Awasthi

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