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अपना टुकड़ा

rashmi gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            टुकड़े टुकड़े कर कर कर अपना टुकड़ा खो दिया
        
                                                    
                            
जब रात अकेली आंख झपे न
आँखें में आंसू भरकर कर रो दिया
देखने गए चांद तलक हम
कहीं कोई फल हमें दिखे न
कौन जाने इस फलाहारी में कब अपना बंजर बो दिया
आवाज उठी कि उठ जाऊं
भौंरा भी अब तो खो गया
सब बना रहे है इतना सब कुछ तो
सबने उसमें ही सब कुछ खो दिया
तिनका तिनका करते करते अपना टुकड़ा खो दिया
एक वर्ष पहले
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