कचरे का ढेर नहीं मैं पुस्तक हूं।
तुम्हारे सुंदर जीवन की दस्तक हूं,
भरी हूं शब्दों से पर शोर नहीं हूं मैं,
तुम्हारे मन में जागे तूफानों का अंतिम छोर हूं मैं,
मेरा हृदय उन बंद पन्नों पर दबकर सिसक रहा है,
अब जीवन मेरा वेदना से कसक रहा है,
मेरी रूह को टटोलकर तुमने दुनिया को जाना था
मुझसे ही लेकर रोशनी तुम मुझसे भी आगे राहों पर बढ़े,
मगर अफसोस आज मंजिल पाते ही तुम मुझे भूल गए,
मेरा वजूद ही मिट्टी में मिला गए
-रानी पुंडीर