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दीप जलता रहा

Ramakant Chaudhary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चल पड़ा कारवां फिर रुका ही नहीं।
        
                                                    
                            
तानाशाहों के आगे झुका ही नहीं।

लाख कोशिश करी लाख टोटके किए,
उसका जादू सभी पर चला ही नहीं।

आँधियाँ शर्म से मुँह छुपाने लगीं,
दीप जलता रहा वह बुझा ही नहीं।

मोटी जंजीर जिसके गले में पड़ी,
उसके अंदर का इंसाँ जगा ही नहीं।

जिसके सीने में जज़्बा बग़ावत का हो,
लाठियों से कभी वह मरा ही नहीं।

चाहता था कलम को वह थामे रहे,
उसको शायद किसी ने सुना ही नहीं।

जुल्म से कब डरा है यहाँ हौंसला,
जुल्मियों को ये शायद पता ही नहीं।
 
1 सप्ताह पहले
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