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अपनी जीभ के नीचे दबाकर रखा था ।

Rakesh Vaidya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आदमी की खाल में लिपटी हुई
        
                                                    
                            
इस मक्कार व्यवस्था के बीच
जहाँ हर जुबान बिकाऊ है
और हर थियेटर सिर्फ मनोरंजन का बाज़ार है,
वहाँ एक अदाकार ऐसा भी था
जो संवाद बोलता नहीं,
बल्कि सीधे छाती पर गोली की तरह दागता था !
वह तुम थे नाना
बहुत याद आयेगी तुम्हारी !

एक अदाकार ऐसा भी था,
जो फौलाद की भट्टी से निकलकर
मंच पर आता था,
और अपनी खुरदरी उँगलियों से
लोकतंत्र के उस संभ्रांत चेहरे को खुरच देता था,
जिस पर सजी होती हैं
झूंठी मुस्कानों की परतें !
वो तुम थे नाना,
बहुत याद आयेगी तुम्हारी !

मैं जानता हूँ,
वह ऐसा अदाकार था
जो कला को कोई 'खिलौना'
या 'शौक' नहीं मानता था,
बल्कि उसे ज़ालिम व्यवस्था के सीने पर तनी हुई
एक अदृश्य संगीन समझता था !

वह ऐसा अदाकार था
जो महज़ एक आवाज़ नहीं
बल्कि उस खामोशी का इंतकाम था,
जिसे सालों-साल
इस देश के लाचार और ठगे गए इंसानों ने
अपनी जीभ के नीचे दबाकर रखा था ।
वो तुम थे नाना,
बहुत याद आयेगी तुम्हारी !
- राकेश वैद्य
2 सप्ताह पहले
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