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माँ भारती का लाल...

RAKESH KUSHAWAHA

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सूरज जैसा तेज था उसमें,
        
                                                    
                            
चाँद सी थी शीतलता।
पवन जैसा वेग था उसमें,
अग्नि सी थी निडरता।

वतन वालों क्या बताऊँ,
कैसे सुनाऊँ तुमको,
उसकी अमर कहानियाँ,
हर पल बाधाओं से लड़कर,
और दुखों को सहकर
तपा हो जीवन जिसका।

काशी का गौरव,
हिन्द का वो लाल था,
छोटी सी थी कद-काठी उसकी,
पर हिम्मत उसमें बेमिसाल था।

महादेव की भक्ति थी उसमें,
माँ सरस्वती की शक्ति थी उसमें,
गोरों की दासता से मिले मुक्ति,
तन-मन में दृढ़ राष्ट्र भक्ति थी उसमें।

नन्हे नाम बचपन का उसका,
अपनी माँ का वो बहादुर लाल था,
नतमस्तक हुई उफनती दरिया,
देखकर थम गया काल था,
तैरकर चीरी छाती जल-धारा की,
गंगा पार स्कूल पहुँचा वो नन्हा लाल था।

समर भूमि में थर्रा उठे दुश्मन,
निष्फल उसका हर चाल था,
लाहौर में गाड़ेंगे तिरंगा,
लाल बहादुर का ये अडिग ख़्याल था।

जय जवान जय किसान का,
वो करता गुणगान था,
सरल स्वभाव सादगी भरा जीवन,
तनिक भी न उसमें अभिमान था।

वतन की ख़ातिर, अमन की ख़ातिर,
क़ुर्बान हो गया लाल था,
दो अक्टूबर जन्म-दिवस उसका,
माँ भारती का वो बहादुर लाल था,
माँ भारती का वो बहादुर लाल था....

-राकेश कुशवाहा 'ऋषि'*
 
3 सप्ताह पहले
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