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शायद मेरे लिए यही काफ़ी है।

Rajeshwar Mandal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अक्सर तो नहीं,
        
                                                    
                            
परंतु कभी-कभी मैंने ऐसा महसूस किया है,
जब भी होंठ रखता हूँ मद्धम गर्म चाय की कप पर,
मन में एक अजीब-सा भ्रम पैदा हो जाता है,
जैसे तेरे लबों ने छू लिया हो मेरे लबों को।

मन प्रफूलित,
तन तरंगित,
नयन निमीलित,
लब कंपित
द्वेष विलोपित
हर भाप में तू अंकित
फिर हृदय परिवर्तित,
और खोने लगता हूँ
एक अलग ही दुनिया में।

गौर से देखता हूँ,
कप से उठती उन भापों को,
जो शनैः-शनैः उड़ रही होती हैं,
धीरे-धीरे चाय को ठंडा करते हुए।

मैं रोकना चाहता हूँ उन उड़ती भापों को,
मगर वो रुकती नहीं,
जैसे जा रही हों बेखबर...
मुझे तन्हा कर।

उफ्फ !
खलता है,
बहुत खलता है।

फिर भी न जाने क्यों,
उन भापों को रोकने का मन नहीं करता,
फिर मन में एक ख़्याल आता है —
कोशिश तो बहुत की थी उस वक्त भी,
पर कहाँ रोक पाया था तुझे जाने से।

सही तो नहीं,
पर भ्रम ही सही,
कुछ यादें ज़िंदा हैं अब तलक,
उस गुफ़्तगू की एक शाम की।

ख़ैर,
जाने दो,
मैं कर ही क्या सकता हूँ,
यादें ही सही,
पर मन के किसी कोने में,
ठंडक-सी सुकून देने वाली,
तुम्हारी एक ठहराव तो बाकी है,
शायद मेरे लिए यही काफ़ी है।
13 घंटे पहले
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