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गुल मिला जब भी किसी को, साथ काँटा भी मिला।

Rajesh Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिल की आरज़ू के मुताबिक यहाँ कुछ भी न मिला,
        
                                                    
                            
दरिया मिला समुंदर में, समुंदर केाहीं जाता न मिला।

एक चिराग़ बुझ रहा था अपने वक़्त के हिसाब से,
वक़्त का पहिया चला, इल्ज़ाम आँधी को जा मिला।

शहर अपना भी कभी भीड़ के चंगुल में था मगर,
एक शख़्स के जाने से शहर एकांत में जा मिला।

उम्र भर चलते रहे हम मंज़िल की चाह में,
रास्ता थक कर जहाँ ठहरा, वो दरिया से जा मिला।

क्या मिला, कितना मिला, इसका हिसाब न मिला,
एक मिला हमें मुक़द्दर, वो भी मुक़द्दर से जा मिला।

हर रोज़ कुछ खोते रहे हम ज़िंदगी की दौड़ में,
जब ठहरकर खुद को देखा, अपना ही पता मिला।

हर ख़ुशी की राह में कुछ दर्द रखता है ख़ुदा,
गुल मिला जब भी किसी को, साथ काँटा भी मिला।

यूँ तो जो मिला सभी को, वो हमें भी है मिला,
मिल जाता वो शख़्स भी, तो कहते हमें क्या न मिला।

'अगस्त्य' क्या गिला करें किसी से अब इस ज़िंदगी का,
जो मिला, जैसे मिला, आख़िर वही सबसे बेहतर मिला।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
एक महीने पहले
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