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अनहद का बसेरा

Rajesh Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनहद का बसेरजब जागे, तब ही भागा सियाह दुश्मन अँधेरा,
        
                                                    
                            
अंतरमन में हुआ उजाला, चढ़ गया एक नया सवेरा।

बाहर की सब ऋतुएँ झूठी, भीतर रिमझिम सावन बरसा,
नाम खुमारी ऐसी छाई, मन-मंदिर में हुआ उसका बसेरा।

खिल उठीं मन की कलियाँ, जब उसकी रूह ने डाला फेरा,
दूर हुए सब भ्रम भुलेखे, उजड़ गया सारे ग़मों का डेरा।

'मैं' और 'मेरी' की जंग मिटी, तब असल सुकून मिल पाया,
ख़ुदी मिटी, तब ही दिखा मुझको, चारों ओर एक रूप तेरा।

काया के इस कच्चे कोठे में, जब तेरे नाम की जोत जगी,
लोक-परलोक सब रौशन हो गए, मिट गया कुल अँधेरा।

ख़ुद में ख़ुद को खोकर पाया, उसका सुंदर पावन चेहरा,
रूह में ऐसा नूर उतरा, जो मेरा था, वो सब हो गया तेरा।

पी गया तृष्णा का समंदर, 'अगस्त्य' अजब नज़ारा देखा,
हद की सरहद पार हुई जब, हुआ अनहद का बसेरा।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
2 महीने पहले
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