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तालाबों में धूल है

Rajeev kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तालाबों में धूल है, फाइलों में है फुहार,
        
                                                    
                            
प्यासे जंगल मर रहे, वर्षा का अख़बार।
फटे अधर, सूखी नज़र, आँखों में बस आशा,
इस विशाल वन में खड़ा, मृग था बेहद प्यासा।
लेकिन हर एक दीवार पर, बड़े-बड़े प्रचार,
“हर जंगल तक पहुँच गया, पानी इस बार।”
पास गया तो देखता, लोहे की ऊंची बाड़,
पानी अंदर कैद था, बाहर सूखा झाड़।
द्वार खड़े थे भेड़िए, थीं बंदूकें तैयार,
तालाबों में धूल है, फाइलों में है फुहार।
भेड़िया बोला—"सुन और लगा दे ध्यान,
बिना काग़ज़ों के यहाँ, बचती नहीं जान।
लेकर आ तू दफ़्तरों से प्यास का प्रमाण,
इस जल-संकट के नियम का, कर ज़रा बखान।
ला पहचान-पत्र अपना, ला अर्जी चार,
तालाबों में धूल है, फाइलों में है फुहार।
मरना है तो शौक से तू मौत को बुलाओ,
पर काग़ज़ के तंत्र को यह नियम न सिखाओ।"
तड़प-तड़प कर मृग गिरा, तट पर होकर ढेर,
खबर उड़ी जब वन में तो, पहुँचे सियार-शेर।
एक सियार चिल्ला उठा—"पहले करो जाँच,
यह विशाल जीव यहाँ, आया कहाँ से आज?
यदि यह बाहरी जीव है, मुआवज़ा है रद्द,
बिना अनुमति मरना भी, नियमों के विरुद्ध।"
छपवा दो अख़बार में “है वन में जल अपार”,
यह तो उसकी ज़िद थी जो, प्यासा गया उस पार।
तालाबों में धूल थी, फाइलों में फुहार॥
3 महीने पहले
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