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गर्जन करो गगन पर

Rajeev kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गर्जन करो गगन पर... अब मौन को मिटा दो!
        
                                                    
                            
सोए हुए लहू में फिर, आग तुम लगा दो!
किस राह पर खड़े हो? किस सोच में पड़े हो?
अंधेरों से डरकर, क्यों व्यर्थ ही मुड़े हो?
सिंहासन चक्रवर्ती... थर-थर काँपता जाए!
कायरता की चादर को, फाड़ता तू जाए!
चट्टान सी छाती में, भड़काओ तुम वो ज्वाला...
पिला दो दुष्ट तम को तुम, मृत्यु का ही प्याला!
सुख की भीगी रातों में, क्यों सो रहा स्वदेश?
पीड़ा से काँप क्यों रहा, अपना ही परिवेश?
इन आँखों के अश्रुओं को, अंगार सा बना दो!
बिखरी हुई राख को फिर, ज्वाला सा बना दो!
बाधाएँ मार्ग रोके... तो शूल सम कुचल दो!
गति में ऐसी तपन लाओ, कि राह ही बदल दो!
माँगता न दया कोई... ना मैं वरदान माँगता हूँ!
मैं तो बस प्रलय का ही, विकराल गान माँगता हूँ!
मिट्टी से कह दो अब... कि संग्राम हो रहा है!
उजाले की खातिर फिर... नया विहान हो रहा है!
3 महीने पहले
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