कुछ भी सदा नहीं
सदा न संग सहेलियाँ,
सदा न जीवन है जग में,
सदा न फूल खिलता है,
सदा न सावन रहता है।
सदा न जवानी रहती है,
सदा न काले केश,
सदा न रहती गले में
प्रियतम की बाँहों की रेख।
समय की धारा बहती जाती,
हर रंग धीरे-धीरे ढलता है,
जो आज है अपना-अपना,
कल वह भी कहाँ रहता है।
दर्पण में जो रूप सँवारा,
वह भी एक दिन धुँधला जाएगा,
यौवन, सौंदर्य, प्रेम का मौसम
चुपके से बीत जाएगा।
ढलते-ढलते ढल जाती है
हर साँझ जीवन की,
जैसे पेड़ की छाँव ढलती है
धीरे-धीरे धरती पर।
इसलिए जो आज मिला है,
उसका मान करो, मुस्काओ,
कल के भरोसे मत छोड़ो जीवन,
आज को जीते जाओ।
— रजनी