विज्ञापन

दस्तख़त का रिवाज़

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दस्तख़त का रिवाज़
        
                                                    
                            

कोई तो मुकरा होगा अपनी ज़ुबान से,
वरना दस्तख़त का रिवाज़ कैसे आया होगा।
कोई तो बेवफ़ा निकला होगा अपनी बात से,
वरना रजिस्ट्री का रिवाज़ कैसे आया होगा।

कभी ज़ुबान ही वचन हुआ करती थी,
बात ही सबसे बड़ा सबूत हुआ करती थी।
फिर किसी ने तोड़ा होगा भरोसा किसी का,
तभी कागज़ पर लिखने की ज़रूरत आई होगी।

कोई तो अपनी बात से पलटा होगा,
कोई तो वादे से मुकरा होगा।
किसी ने तो विश्वास को ठेस पहुँचाई होगी,
तभी दस्तख़त को गवाही बनाया होगा।

आज हर रिश्ते में प्रमाण माँगा जाता है,
हर वादे को कागज़ पर उतारा जाता है।
शायद इंसान ने इंसान पर भरोसा खो दिया,
तभी तो हर बात का दस्तावेज़ बनाया जाता है।
— रजनी
2 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

dinesh chauhan

3544 कविताएं

View Profile

Manoj Kumar

420 कविताएं

View Profile