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चीटी चावल ले चली

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चीटी चावल ले चली
        
                                                    
                            

चीटी चावल ले चली,
बीच में मिल गई दाल,
कहत कबीर दो ना मिले,
एक ले, दूजी डाल।

जीवन भी कुछ ऐसा ही है,
हर चाह पूरी कहाँ होती है,
कुछ पाने की खातिर अक्सर,
कुछ चीज़ें छोड़नी होती हैं।

जो मिला, उसे स्वीकार करो,
जो छूटा, उसका ग़म न पाल,
कहत कबीर यही जीवन है—
एक हाथ में चावल,
दूजे हाथ में दाल।
— रजनी
2 महीने पहले
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