बर्बरता देखो शासन का,
क्या परिचय देते अनुशासन का।
अहिंसा का भाषण देते हैं,
लेकिन खुद संज्ञान न लेते हैं।
अपनी गलती छुपाने को,
क्या से क्या कर देते हैं।
अपने हक़ की बात जो कह दे,
जैसे सम्मान ही हर लेता है।
जंतर-मंतर की पावन धरती,
जन-जन का विश्वास बनी।
हाथों में था सत्य का दीपक,
आँखों में बस आस बनी।
न कोई वैर, न कोई क्रोध,
न मन में कोई द्वेष था।
संविधान को साथ लिए बस,
न्याय माँगने का संदेश था।
लोकतंत्र की पावन धारा,
जनमत से ही चलती है।
जब जनता की पीड़ा बढ़ती,
हर चौखट पर पलती है।
यदि प्रश्नों से डर जाएगा,
तो उत्तर कौन सुनाएगा?
मौन अगर दीवार बनेगा,
विश्वास कहाँ टिक पाएगा?
सत्ता का सौंदर्य तभी है,
जब सेवा उसका धर्म बने।
हर निर्धन की आँख का सपना,
हर पीड़ित का मर्म बने।
जंतर-मंतर केवल स्थान नहीं,
जन-मन का विश्वास है।
जहाँ शांत स्वर भी गूँज उठे,
वही सच्चा इतिहास है।
हाथों में तख्तियाँ थीं केवल,
हृदय में भारत बसता था।
हर नारा यह याद दिलाता,
जन ही लोकतंत्र रचता था।
शक्ति नहीं पहचान किसी की,
पहचान न्याय दिलाने में।
यश नहीं मिलता सिंहासन से,
मिलता जन को अपनाने में।
कुर्सी आती, कुर्सी जाती,
लेकिन जनविश्वास रहे।
शासन वही महान कहलाए,
जो हर आँसू के पास रहे।
मतभेदों का मान रहे तो,
राष्ट्र और भी ऊँचा होगा।
संवादों का दीप जलेगा,
हर अँधियारा छोटा होगा।
कदम बढ़ें संविधान लिए जब,
रास्ते स्वयं सँवर जाएँ।
सत्य अगर संग चल पड़ता है,
पत्थर भी फिर पिघल जाएँ।
न्याय देर से आए लेकिन,
आशा का दीप बुझने न दो।
जन की वाणी का सम्मान करो,
विश्वास कभी टूटने न दो।
इतिहास कलम से लिखता है,
तलवारों की धार नहीं।
जनता सबसे बड़ी शक्ति है,
इससे बढ़कर सरकार नहीं।
भारत की यह पावन धरती,
सत्य जहाँ सम्मानित हो।
जन की आवाज़ सुनी जाए,
हर नागरिक प्रतिष्ठित हो।
आओ ऐसा समय रचें हम,
जहाँ संवाद ही जीत बने।
न्याय, करुणा और संवेदना,
भारत की पहचान बने।
- राजन सोनी