विज्ञापन

ज़ेहन का घाव समझो भर ही गया

Rahul Shrivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सोच सोच की
        
                                                    
                            
थकान खाली

कितने बना दिए
मकान ख़याली :(

दस
दिन बस,
करना है वो काम

उसके
बाद सिर्फ
आराम ही आराम...

उसके बाद
हर एक पल
एक नया इनाम...
एक नया सलाम...

रुख़्सत होंगे
बादल सारे...

होगा सर पे, खुला आसमान!

क्या ऐसे में,
कोई दोस्त ढूंढने जाऊं?

क्या ऐसे में,
कोई दोष बुलाके लाऊं?

कुछ मिल गया...
तो ठीक है...

चैन... तो हमेशा से ही
मेरा मीत है...

सेहत पे, काम होता रहेगा

ज़ेहन का घाव समझो भर ही गया 
-राहुल
6 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Nathuram Kaswan

8651 कविताएं

View Profile

Kshitiz Srivastava

41 कविताएं

View Profile