क्या पतझड़ को भी अपने बिछड़े हुए पत्ते याद आते होंगे?
शायद हां
वो पत्ते जो डाली के साथ थे,
जो वसंत का कभी फरमान थे।
वो पत्ते हवा के साथ गए,
कुछ आंगन में ही बिखर गए।
कुछ राहों में सिमट गए।
उन्हें ना रोका पतझड़ ने कभी,
क्योंकि बिछड़ना है कभी ना कभी।
पतझड़ का काम है
नए पत्तो की जगह बनाना
जो बीत गए उसे भुलाना
क्योंकि जो बिखरा
वो अगली बहार की सौगात बना।