कागज की कश्ती से समुद्र पार नहीं होता
पर कागज का गंभीर और तो नहीं होता।
नाराज नहीं होता कागज शांत रहता है
गुस्सा पीकर औरों का वह शांत करता है।
कुछ भी लिख दो कागज पर वह चुप रहता है
कटु या मृदु हर विचार वह सबका सहता है।
अन्याय लिखा हो कागज विवश हो जाता है
खुद को कितना दोषी कागज तब पाता है।
कभी गागर बनता तो कभी सागर बनता
बोझ कम कर मानव का पर्वत कागज बनता।
कितनों का सहारा बन कागज ने फर्ज निभाया
फिर भी कितनी बार उसने खुद को रद्दी पाया।
मिट जाता है कागज चाहे गल जाता है
शब्दों की गरिमा का साथ उसे निभाना है।
खुशी हो या गम कागज सबका साथी है
दीया है कागज तो मानव मन बाती है।
-पूनम पाठक