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क्या रूठ से गए हैं परिंदे भी इस शहर से

Professor Ravindra Pratap Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            याद जब आती है जब वह सर्द सुबह गांव की
        
                                                    
                            
आती हैं हजार बुलबुल खयालों में गांव की।

कल की वो सर्द सुबह ,जब कुहासा की थी चादर
कैसे उन अनारों पे थी बुलबुलों की चहचहाहट ।

कितनी कितनी दर्जनों साथ आती और जाती
वैसे ये कहां रहती कहां जाती और कहां आती।

नहीं दिखती हैं ये बुलबुल इतनी कभी शहर में
क्या रूठ से गए हैं ये परिंदे भी इस शहर से ।
8 महीने पहले
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