याद जब आती है जब वह सर्द सुबह गांव की
आती हैं हजार बुलबुल खयालों में गांव की।
कल की वो सर्द सुबह ,जब कुहासा की थी चादर
कैसे उन अनारों पे थी बुलबुलों की चहचहाहट ।
कितनी कितनी दर्जनों साथ आती और जाती
वैसे ये कहां रहती कहां जाती और कहां आती।
नहीं दिखती हैं ये बुलबुल इतनी कभी शहर में
क्या रूठ से गए हैं ये परिंदे भी इस शहर से ।