क्या एक बेटी सच में बोझ बन जाती है
अपना कहते कहते न जाने कब वो पराई हो जाती है
ये रिवाज बहुत पुराना है
बेटियों का अपना कोई घर नहीं होता
बस मुसाफिरों सा ठिकाना है ।
संस्कारों के नाम पर इतनी बेड़ियों में बंध चुकी हैं
कि उसे लगता ही नहीं कि कोई जेलखाना है। ।
ये झूठ ये ढोंग ये तमाशा क्यों कर रहे हो
हमें अपना मानने का दिखावा क्यों कर रहे हो
यूं तो हर ख्वाहिशें छीन ली है तुमने हमसे
अब ये आंखों में बेमतलब के आंसू क्यों भर रहे हो
दिख रहे हैं हर चेहरे अब नकाब हट रहा है धीरे-धीरे
जो ख्वाब हमने साथ देखे अब वो ख्वाब बंट रहा है धीरे-धीरे
मैं क्या देखूं क्या कहूं किधर जाऊं अब तो यहां रहा नहीं कोई मेरा
अब तो हर रिश्ता मेरे दामन से छट रहा है धीरे-धीरे
जिसको बचपन से सम्हाला संवारा
जिसकी हर तस्वीर को दिल में उतारा
ऐसी भी क्या ग़लती मेरी
जो मेरे अपनों से मुझे एक पल में भुला दी जाती है
क्या एक बेटी सच में बोझ बन जाती है
अपना कहते कहते न जाने कब वो पराई हो जाती है...