बढ़ा कर दर्द ओ तमन्ना अपना ही बेचैन दिल को भी समझाना पड़ा हमें बिखरती यादों को समेटना पड़ा
खुशियां मेरी कभी तुमने भी अपना समझा कहां रख के पत्थर दिल पर चिराग़ ए हमें अब बुझाना पड़ा
रहा है गुमां अपनी वफाओं पर भी हमें बहुत जान कर मिजाज़ आपका खुशियां भी सारी समेटना पड़ा
करूं क्या तेरी मर्जी के मुताबिक दर्द सहना सीखना पड़ा मिटा के अरमां सारे सच क्या है सोचना पड़ा
करके गुस्ताखियां मिला कब किसी को नवा कर सर सामने तेरे हमें अरमां दिल का सारा मिटाना पड़ा