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महरूम जिंदगी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बढ़ा के फासला तुमसे दिया आस का अब बुझाना हमें पड़ेगा जल कर अपनी ही लगाई में अब दूर तुमसे रहना पड़ेगा
        
                                                    
                            
तुम ना हो सके मेरे तो क्या हुआ निभाया मैने रस्म ए वफा बड़ी शिद्दत से खाकर धोखे हमें अब अंदाज़ तेरा सहना पड़ेगा
सच तो ये भी वफा की राह में तुम सा ना मिला है हमें कोई सुन कर वादे हज़ार मगर ऐतबार तुझ पर हमें करना पड़ेगा
मिले ना तुम तो करके दोस्ती कांटों से दर दर भटकना पड़ा हमें आज़मा के तुम्हें इस बार दिया जो दर्द हमें सहना पड़ेगा
करके मायूस हमें गर खुश हो तो ये मर्जी तेरी गुजार के जिंदगी गर्दिश ए हालात में हमें अब बार बार जीना मरना पड़ेगा
एक महीने पहले
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