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फसाना ए तड़पती यादें

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनी ही नाकामियों का जश्न मैं मना रहा हूं चल कर अजनबी शहर के अजनबी रस्तों में दर्द मैं बढ़ा रहा हूं
        
                                                    
                            
गिला तुमसे करना आसान इतना नहीं बढ़ा कर अब मैं मुश्किलें सारी लौट के तेरे दर से फासला बढ़ा रहा हूं
सामने तेरे जिक्र मुफलिसी का भी अब मैं कर सकता नहीं कर के इंतजार तेरे वादों का दूरियां बढ़ा रहा हूं
बगैर तेरे मेरी जिंदगी को हुआ क्या सोच कर कुछ देर डूब कर ख्वाबों से अब मैं दिल अपना बहला रहा हूं
उदासियां भी कर रही इशारा मुझको हुआ क्या मैं होकर अब मजबूर तेरी दुनिया से फासला बढ़ा रहा हूं
1 सप्ताह पहले
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