विज्ञापन

फसाना ए तड़पती यादें

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जाने कैसी मजबूरियों में जी रहा हूं बढ़ा के फासला तुमसे अब होकर बेचैन जिंदगी से दिल को मैं सता रहा हूं
        
                                                    
                            
गुजारा होता नहीं मगर गुजारा करना पड़ा है हमें सता के बेचैन दिल बार बार फिर भी रस्म ए मैं निभा रहा हूं
होगा ना हमसे अरमां दिल का बुझाना मिल कर तुमसे जुदा ना हुए दिल से कभी अरमां दिल में सजा रहा हूं
करके दोस्ती कांटों से मिला कब चैन ओ सकूं दिल को अंजाम ए वफा जो होगा देख लेंगे दर्द मैं बढ़ा रहा हूं
मिले ना तुम तो करके दोस्ती कांटों से दर्द बढ़ाना पड़ा सता कर बेचैन दिल को चिराग़ ए दिल मैं जला रहा हूं
2 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all