विज्ञापन

फसाना ए महरूम जिंदगी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं कुछ दिनों से होकर तेरी दुनिया से दूर अपने ही घर रह के मजबूर अब रफ्ता रफ्ता सुधर रहा हूं
        
                                                    
                            
हकीकत को समझ कर हकीकत तेरी खबर मैं क्या लेता मैं करूं क्या मैं खुद से ही बेखबर रहा हूं
कैसे कहूं नसीब न हुआ मेरा आग बरस रही गम ए हयात में बन कर राख अब मैं ही बिखर रहा हूं
कभी सोचो अचानक कैसे बदल जाऊंगा हकीकत ये है तेरी गली से गुनगुना कर ही गुज़र रहा हूं
ये न सोचा देख कर हमें तू बदल जाएगा कुछ सोच समझ के मैं आज तेरी गली से ही गुज़र रहा हूं
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7473 कविताएं

View Profile