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फसाना ए दर्द ए वफा

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आकर करीब तेरे किया महसूस इज्जत तर्क ए वफा की भी नहीं और रहा बेखबर तू जैसे कुछ हुआ नहीं
        
                                                    
                            
बर्बाद कर हमें खाक में मिलाने वाले हाल मेरा सोचा भी नहीं मिट गई हाथों की लकीरें दिखा तुम्हें कुछ नहीं
गर तू खफा मुझसे तो अभी बिछड़ जा बुरा वक्त जब आया इंसानियत कत्ल हुआ कहना तुमसे कुछ नहीं
मैं इस वास्ते चुप बैठा कि कुछ और न तमाशा बने और तू ही लगा सोचने जैसे कोई गिला तुमसे कुछ नहीं
जगा कर अरमां इक बार खत मैंने तुम्हें ही लिखा खातिर या लिहाज से जवाब में लिखा तुमने कुछ नहीं
एक महीने पहले
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