विज्ञापन

अफसाना ए बदनसीबी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बरक्कत मेरी दुआओं में होने लगा गलतफहमियां जो खिलाफ मेरे पाल रखा था तुमने वो अब कम होने लगा है
        
                                                    
                            
क्या पता था आप फिर उसी राह पर जहां मिले थे कभी मुझसे मिलने की तमन्ना करने लगे महसूस होने लगा है
अभी तक अपनी बदनामियों से डर गया था बहुत मिला जबसे हौसला तेरा बेचैन दिल भी रस्ता बदलने लगा है
करके इनकार अरमां मिटाना समझ ना पाया मैं या रब दिखाया तुमने क्या क्या मंजर सोच के दिल डरने लगा है
तुमने सोचा कभी दरिया सिमटने में वक्त तो लगता है किस्मत का लिखा मिट ना सका दिल फिक्र करने लगा है

 
1 सप्ताह पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Brijesh saroj

1 कविता

View Profile