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वास्ता भी कहाँ है

Prashant Dwivedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमको नहीं है अब तुमसे ज़रा-सी भी नाराज़गी,
        
                                                    
                            
बस अब तुमसे कोई वास्ता भी कहाँ है।
तुम दिन, तुम सुबह, तुम शाम, तुम रात थीं मेरी,
मगर अब तुमको पाने की चाहत भी कहाँ है।
3 सप्ताह पहले
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