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तुम और कायनात

Prabhat Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस दिल ने तुम्हें अपना बना लिया,ज़माने को ख़ुद से ख़फ़ा कर लिया।
        
                                                    
                            

बेअदब हवाओं ने ऐसी शरारत की है,दुपट्टा उड़ाकर उनका, कयामत की है।
इन गुस्ताख़ हवाओं ने,मेरे महबूब को नाराज़ कर दिया।

वो रूठे तो ऐसा लगा, थम गई ज़िंदगी,इस नाराज़गी को भी मैंने समझा बंदगी।
मनाऊँगा अब मैं उनको कुछ इस तरह,जैसे रूठे हुए ख़ुदा को मना लिया।

कहो इन हवाओं से, गुज़रें अब अदब से,रिश्ता हमारा है सबसे गहरा और सबसे जुदा।
कि ज़ुल्फ़ों के साए को महबूब के,मैंने अपनी धड़कन का मसीहा बना लिया।

धड़कता है दिल अब तो बस उनकी आहट पे,सदाएँ हैं मेरी बस उन्हीं की चाहत पे।
पाकर उन्हें मिट गईं सब अधूरी ख़्वाहिशें,हर ख़्वाब को मैंने मुकम्मल कर लिया।
— प्रभात कुमार 'प्रभात'
एक महीने पहले
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