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मिलेगी मंज़िल उसे भी यक़ीनन 'प्रभात'

Prabhat Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी हर ख़ुशी की सहज चाह में तुम हो,
        
                                                    
                            
धड़कते हुए दिल की आह में तुम हो।

सलीक़ा जो जीने का सीखा जहाँ में,
उसी सादगी की पनाह में तुम हो।

छुपाकर रखूँ जिसे मैं इस दुनिया से,
मेरे ख़्वाब के हर गवाह में तुम हो।

कहाँ ढूँढूँ मंज़िल तड़पते हुए दिल की,
भटकती हुई मेरी राह में तुम हो।

मिलेगी मंज़िल उसे भी यक़ीनन 'प्रभात',
कि जिसकी दुआ और चाह में तुम हो।
-प्रभात कुमार “प्रभात”
एक महीने पहले
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