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उदासी का समाँ

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत कुछ कहना था लेकिन किसे जज़्बात कहते
        
                                                    
                            
नहीं तुम पास किससे अपने हम हालात कहते

तेरी नाराज़गी से जश्न भी मातम बना है
मेरा निकला जनाज़ा कैसे हम बारात कहते

ग़म-ए-दिल के ये अंधेरे सताते हैं बहुत अब
ख़ुशी के इन उजालों को भी हम तो रात कहते

उदासी का समाँ तारी रहेगा हम पे कब तक
हैं दर्द-ए-दिल में भीगे कैसे हम बरसात कहते

न आओगे कभी तुम लौट कर माने नहीं दिल
कसीली इतनी ख़ुद से कैसे हम भी बात कहते
2 महीने पहले
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