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मुसाफ़िर हैं सभी

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुसाफिर हैं सभी तो ज़िंदगी के इस सफ़र में
        
                                                    
                            
शमा बनकर जलो तुम भी किसी की रह-गुज़र में

सफर ये ज़िंदगी का पल में हो जाएगा पूरा
तक़ाज़ा है खुशी ही बाँटो उम्र-ए-मुख़्तसर में

हमारी दास्ताँ जब कल ज़ुबाँ पर हो किसी की
मसर्रत मुस्कुराए उनके दिल के भी नगर में

रुलाते सब है तुम हँसना सिखाओ तो किसी को
कला ग़म बाँटने की तुम करो शामिल हुनर में

चला जो धूप में मंज़िल भी उसको ही मिली है
नहीं बैठो कभी थक कर भी साया-ए-शजर में

है दिल में जोश, ताक़त जिस्म में जब तक भी 'पारुल'
किसी के काम आते रहना जीवन की डगर में
2 सप्ताह पहले
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