विज्ञापन

इतनी मज़बूती से खड़ी हो जाओगी

paramjit kaur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब तुम अपने स्वाभिमान के लिए खड़ी होगी…
        
                                                    
                            
तुम सहने की अपनी सारी सीमाएँ
तोड़ दोगी।
सब पूछेंगे-
“सब ठीक तो है?”
और पहली बार
तुम्हारे भीतर से
तुम्हारी अपनी आवाज़ उठेगी
“नहीं… अब ठीक नहीं है।”
वो जो मोम-सा दिल लिए
हर चोट सहकर भी मुस्कुराती थी,
उसे गालियों और तानों के शोर में
अब दफ़्न नहीं होने दोगी।
न किसी का झूठा डर
तुम्हें डराएगा,
न किसी की इजाज़त
तुम्हारे फ़ैसले तय करेगी।
तुम अपने सच के साथ
इतनी मज़बूती से खड़ी हो जाओगी
कि ज़माने का शोर
धीरे-धीरे
ख़ुद ही धीमा पड़ जाएगा।
दुनिया कहेगी,
“बदल गई हो तुम।”
और तुम…
अपने स्वाभिमान पर
हल्की-सी मुस्कान रखकर
आगे बढ़ जाओगी।
क्योंकि तुम बदली नहीं हो…
बस अब
ख़ुद को खोकर
किसी को पाने से
इनकार कर दिया है।
और यही वह पल है
जब एक औरत
बिखरती नहीं…
अपने ही भीतर से
और निखर जाती है।
-अपराजिता परम
3 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7364 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13069 कविताएं

View Profile