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प्रभात के शेर

प्रभात सनातनी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमने जमीं का सू-ए-चमन देखा ही नहीं,
        
                                                    
                            
परिंदा शाख पर आशियां कैसे बनाएगा।
ये जहां गरज परस्त है वफा कौन करेगा,
तेरी दास्तां लिख आस्मां को कौन बताएगा।।

इन परिंदों की वफा बस आस्मां समझता है,
इंसान अपना वजूद खुद मिटा रहा है अब।
टूटे हुए घुंघरूंओं को कौन देखता है भला,
दिल से निकाला गया हूं कौन आ रहा है अब।।

फुर्कत मिला है मुझे हिजाब किस बात का,
इजहार-ए-हाल का बे-खुदी कर रहा हूं मैं।
अब राज-ए-दिल शोखी़ हो गई है उसकी,
हुस्न-ए-बहारे की तारीफ कर रहा हूं मैं।।

फरेब-ए-वफा में खुद को जहमत उठाना पड़ा,
दिलरुबा की आरज़ू में खुद को झुकाना पड़ा।
इजाजत मांगी थी हमने जख्म देकर गई है वो,
बस राज-ए-दिल का खुद को ही छुपाना पड़ा।।

मैं बर्बाद ए मोहब्बत था दुआ में शामिल न हुआ,
वो मेरे जुर्म ए मोहब्बत में भी शामिल न हुआ।
इकरार ए मोहब्बत की वफा किया करती थी,
नयनों में अश्क भी और मैं भी तन्हा रह गया।।
-प्रभात सनातनी "राज" 
एक महीने पहले
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