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सपने और रिश्तों की कशमकश

pankhuri singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देखे तो थे बहुत सपने
        
                                                    
                            
चूल्हे में झोंक दिए
उनके चलते रिश्ते जलने लगे
ताप इतनी तेज थी कि
गर नहीं संभालती तो
सब खाक होने चला था
किसी एक को चुनना पड़ा
शायद वक्त का तकाजा रहा
सपने खुद ब खुद बुझने लगे
रिश्ते सब पनपने लगे
सोचती हूं
क्यों दोनों में तालमेल नहीं बैठा पाई??
क्या एक का जलना जरुरी था??
यहां आकर शायद शिकस्त खा गई
या शायद मैंने ही ये राह चुनी थी
सपनों से ज्यादा रिश्तों को अहमियत दी
पर रिश्तों के नीचे दबी सपनों की चिंगारी
आज भी बाकी है
बस इंतजार है सही वक्त सही दिशा का
 -सरिता सिंह
2 महीने पहले
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