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"सांध्य-क्षितिज का साक्षी"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह जीवन का अवसान नहीं है—
        
                                                    
                            
धुंधलके में विलीन होती कोई पगडंडी नहीं,
यह तो सांध्य-क्षितिज की वह पावन वेला है
जहाँ कोलाहल शांत हो जाता है,
और चेतना अपनी ही धुरी पर
विश्राम पाती है।

समय की मंद, अदृश्य बयार ने
बड़ी कोमलता से, बिना किसी क्षोभ के
हमें धकेल दिया है सक्रियता के मंच से किनारे।
पर यह कोई निष्कासन नहीं,
यह तो आमंत्रण है—
नेपथ्य की गरिमा में उतर जाने का।

मंच के उस पार, अग्रिम दीर्घा में
अब एक आसन सुरक्षित है हमारे लिए।
कितना सुखासीन, कितना निश्चिंत!
जहाँ हम अभिनेता से 'द्रष्टा' हो जाते हैं,
और जीवन-रंगमंच की अनवरत लीला
एक नए अर्थ में उद्घाटित होती है।

अतीत की धूप-छाँव, आकांक्षाओं की तपन,
पाने और खोने का वह आदिम द्वंद्व—
सब अब बहुत पीछे छूट गया है।
इस शांत दूरी से देखने पर
हर हार-जीत, हर सुख-दुख
एक सुंदर संतुलन की भाँति प्रतीत होता है।

संचित अनुभवों की यह जो परिपक्वता है,
यह कोई बोझ नहीं, एक जाज्वल्यमान आलोक है।
इस आलोक में संसार के सारे विकार
भस्म हो जाते हैं,
और शेष रह जाती है—
एक मूक, गहरी, आत्मिक शुचिता।

यह सांध्य-वेला एक पवित्र सेतु है
स्मृतियों के पारदर्शी वितान और
आने वाले अनंत सन्नाटे के बीच।
यहाँ न कोई भय है, न कोई अधूरी तृष्णा,
केवल एक अलौकिक संतोष है,
जो भीतर बहती किसी अदृश्य नदी सा शांत है।

इसलिए, हे जीवन के कुशल शिल्पी!
इस ढलती हुई सांझ का स्वागत करो।
सक्रियता की दौड़ थमी है, तो क्या?
द्रष्टा भाव का आनंद तो अभी पूर्ण है।
जब तक भीतर यह बोध जीवित है,
यह वृद्धावस्था एक उत्सव है—
परम तत्व में विलीन होने का।
एक दिन पहले
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