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"समर्पण का रहस्यवाद"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह कैसी पराजय है,
        
                                                    
                            
जिसमें क्षोभ नहीं, कोई मर्म नहीं।
मैं खड़ा हूँ अपनी ही सीमाओं के तक पर,
जहाँ एक मौन स्वीकृति
अहंकार के ऊँचे प्राचीरों को
रेत की तरह ढहा देती है।

जिसने मुझे जीत लिया,
वह कोई बाहरी शत्रु या कालखंड नहीं।
वह तो एक विराट शून्य है,
जिसकी अगाध गहराई में
मेरा अस्तित्व, अपनी पूरी सत्ता के साथ,
विलीन होने को आतुर रहता है।

मैं पूछता हूँ स्वयं से—
वह कौन है जो अदृश्य रहकर भी जीतता है?
कोई उत्तर नहीं आता,
बस एक अनजानी सी अनुभूति
हृदय के कोनों में तैर जाती है,
जिसे परिभाषित करना बुद्धि के वश में नहीं।

जब तक था संघर्ष स्वयं को सिद्ध करने का,
मैं हर मोर्चे पर अजेय रहा।
पर जैसे ही सम्मुख आया वह अनंत सत्य,
सारे अस्त्र-शस्त्र स्वतः छूट गए,
और इस हार में ही
मुझे अपनी पहली वास्तविक मुक्ति मिली।

अंधेरे कमरों में टटोलता हूँ जब अपने पदचिह्न,
तो पाता हूँ कि मेरी हर हठ,
उसकी एक कोमल विवशता के आगे झुक गई।
यह आत्मसमर्पण किसी भय की उपज नहीं,
बल्कि अपने ही भीतर छिपे
उस परमात्मा से साक्षात्कार का क्षण है।

जीतने वाले ने कुछ माँगा नहीं,
न ही मैंने कुछ सँभाला।
एक निष्काम भाव का उदय हुआ,
और इस महा-पराजय के मरुस्थल में
तृप्ति के झरने बह निकले,
जो केवल हारने वाला ही पी सकता है।

पराजित होकर भी मैं रिक्त नहीं हुआ,
बल्कि उस परम चेतना से भर गया हूँ।
अब कोई दूरी नहीं बची
विजेता और इस विजित के बीच;
दोनों मिलकर एक अखंड मौन में
परिवर्तित हो चुके हैं।

मैं अक्सर उसी के हाथों परास्त हुआ हूँ,
जिसने मुझे अपने भीतर समेट लिया।
यह हार ही मेरा परम गौरव है,
जहाँ खोकर खुद को,
मैंने उस अज्ञेय तत्व को पा लिया,
जो आदि और अंत से परे है।
एक महीने पहले
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