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"प्रेम या स्वामित्व?"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जहाँ स्नेह व्यापार बने,
        
                                                    
                            
प्यार जहाँ उपकार बने,
वह बंधन इक कारा है,
छूटा प्रेम-किनारा है।

भीख नहीं है यह अपनापन,
भावनाओं का पावन अर्पण,
पर जहाँ दान सा बँटता है,
आत्मसम्मान वहाँ घटता है।

एहसानों का भारी बोझ,
गिनता है जो क़ीमत रोज़,
वह तो केवल स्वामी है,
रिश्तों में अगामी है।

प्रेम नहीं जागीर किसी की,
न संपदा है यह अपनों की,
अहंकार का जो दे पुरस्कार,
व्यर्थ है उसका सब सत्कार।

कर्ज़ समझ जो प्रेम चुकाए,
पल-पल जो औक़ात दिखाए,
उस महफ़िल से दूरी भली,
मुरझाए जहाँ मन की कली।

विद्रोह नहीं, यह आत्म-रक्षण है,
रिश्तों से गरिमामय प्रस्थान है,
सिर झुके जहाँ, वह प्यार नहीं,
दिल जुड़े बिना, संसार नहीं।

छाँव जहाँ अब घाव बने,
दर्प जहाँ पर भाव बने,
उस साए को तज देना ही,
खुद को पुनः समझ लेना ही।

यह टूटना नहीं, बचाना है,
निज गरिमा को अपनाना है,
रिश्तों का अंतिम सत्य यही,
स्वाभिमान से बड़ा कुछ नहीं।
एक दिन पहले
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