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"मौन का यथार्थ"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समय ने कब बदली है केंचुली?
        
                                                    
                            
वह तो बस एक गवाह है, बहती नदी सा।
मनुष्य को बदलने के लिए
काफ़ी होता है एक अदृश्य प्रहार,
एक गहरा, भीतर तक छील देता ज़ख्म,
जो रक्त नहीं बहाता,
पर चेतना की चूलें हिला जाता है।

जो अश्रु बह गए लोक के सम्मुख,
वे तो पानी थे, भाप बन उड़ गए।
दुनिया ने उन्हें नापा, तोला और भुला दिया,
पर वह पीड़ा, जो ओठों के भीतर घुट गई,
जिसने एकांत के सन्नाटे में
मौन का खारा घूंट पिया,
वह वक़्त के साथ और घनी होती गई।

वह मौन तकलीफ़ कोई बोझ नहीं,
वह एक धीमा तेज़ाब है।
जो सोख लेता है चेहरे की मासूमियत,
चबा जाता है भरोसे की आदिम वृत्ति,
और अंत में छोड़ जाता है—
एक यांत्रिक, ठंडी मुस्कान,
जिसके पीछे का शून्य कोई पढ़ नहीं पाता।

लोग कहते हैं—वह कठोर हो गया,
रूखा हो गया, अचानक बदल गया।
पर कोई नहीं देखता उस अदृश्य कारखाने को,
जहाँ हालातों के भारी हथौड़े ने
एक कोमल, स्पंदित हृदय को
कूट-कूट कर पत्थर में ढाल दिया।
बदलाव आकस्मिक नहीं, संचय होता है।

न्याय की तराजू लेकर बैठने वालो!
आचरण पर अंतिम मुहर लगाने से पहले,
ज़रा उस मरुस्थल का भी नक्शा देखो,
जिसकी तपती, झुलसती रेत पर
वह अनगिनत बार नंगे पाँव गुज़रा है।
कठोर व्यवहार के पीछे
छिपी होती है एक लंबी, अकेली यात्रा।

सभ्यता के इस घने कोलाहल में,
सबसे भीषण और निर्णायक युद्ध
वे ही लोग मौन रहकर लड़ रहे हैं,
जो बाहर से झील की तरह नीरव हैं।
उनका यह महामौन कोई कायरता नहीं,
अपितु अपने भीतर के तूफ़ान को
बाँधकर रखने का एक सजग यथार्थ है।
एक महीने पहले
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