विज्ञापन

"जैविक यन्त्र एवं संवेदना का आकाश"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            
चमचमाती रोशनी के बीच में,
खुल रहा था परत-दर-परत यहाँ;
रक्त, ऊतक, मौन श्रम का रूप यह,
मशीनरी सा चल रहा मानव जहाँ।
अंग अनगढ़, सत्य निर्वस्त्रित खड़ा,
मौन ढाँचे में छिपा ब्रह्मांड बड़ा।

कांच में जिसको सजाते रात-दिन,
थकाते, चलते, शिकायत जो बयाँ;
स्मृतियाँ, दुख, प्रेम को सहता रहा,
दौड़ जीवन की समेटे है यहाँ।
भीतर असंख्य लघु संसार हैं,
जो निरंतर साँस के आधार हैं।

सोचता हूँ किसलिए व्याकुल रहे?
महत्वाकांक्षा, जगत का भय गहन;
क्या शरीर की परतों में दर्ज हैं,
या कि मन के मौसमों का है वहन?
है व्यवस्थित यह बहुत जैविक डगर,
फिर मनुज क्यों ढूँढता भटका नगर?

मात्र अंगों का नहीं समूह हम,
देह से भी पार फैला अर्थ है;
भावनाएँ ही बनाती हैं मनुज,
शून्य इसके बिन सकल सामर्थ्य है।
हाथ की गर्मी, जुदाई का असर,
अंग किसमें वास करता यह सफर?

घाव, धड़कन और हर इक क्लेश को,
दबाकर जीता नहीं यह तन कभी;
तो भला जज़्बात से डरना ही क्यों?
मौसमों की भाँति जो आते सभी।
भय, करुणा, मोह, टूटन, नेह-रस,
नकारें क्यों, क्यों रहें हम स्वयं-बस?

लहर जो उठती उसे सम्मान दें,
सुख-दुख दोनों को सहज स्वीकार लें;
टूटेंगे, बदलेंगे, हम इंसान हैं,
भावनाओं को हृदय में धार लें।
पूर्णता स्वीकार में ही निहित है,
अस्तित्व फिर ही पूर्णता-प्रवाहित है।
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Jagdish chandra

518 कविताएं

View Profile