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"दर्पण के उस पार"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आईना मुझसे नहीं,
        
                                                    
                            
शायद उस व्यक्ति से प्रश्न करता है
जो कभी था—
या जिसे मैं अपना होना समझता रहा।

चेहरे पर उगी हुई समय की लिपि को
मैं पढ़ता हूँ बार-बार,
पर हर अक्षर के भीतर
एक और अनपढ़ अँधेरा खुल जाता है।

मैंने जिन पगडंडियों को
अपनी यात्रा का अर्थ माना था,
वे रेत पर लिखी हुई दिशाएँ निकलीं।
चलता रहा मैं,
और मार्ग मेरे पीछे
अपनी ही स्मृति मिटाता रहा।

यश आया,
जैसे किसी सूने घर में
क्षणभर के लिए धूप उतर आए;
फिर वही दीवारें, वही प्रतिध्वनि।
शब्दों ने बहुतों को सांत्वना दी होगी,
पर मेरे भीतर का मौन
अभी तक अनाथ है।

आज लौटकर देखता हूँ—
तो नगर भी अपरिचित है,
और उसका विस्मरण भी।
कौन किसे छोड़ गया था?
मैं शहर से बिछड़ा,
या शहर मेरे स्वप्न से?

मेरे अपने
मेरे होने का प्रमाण माँगते हैं,
और मैं स्वयं से पूछता हूँ—
क्या सचमुच कोई "मैं" था
जो इन वर्षों में खो गया?
या यह खोज ही भ्रम है,
और दर्पण के उस पार
कोई चेहरा कभी था ही नहीं—

केवल एक प्रश्न था,
जो जन्म से अब तक
मेरा रूप धरकर चलता रहा है।
एक महीने पहले
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