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"अपने ही सम्मुख"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी-कभी सोचता हूँ—
        
                                                    
                            

जो दिखाई देता है,
क्या वह सचमुच मैं हूँ?

या वह केवल
उन दृष्टियों के लिए गढ़ा गया
एक सावधान आकार है,
जो मुझे पहचानना चाहती हैं।

मैंने देखा है—

शब्द
अक्सर मुझसे पहले पहुँच जाते हैं,
और लोग
उन्हीं से मेरा घर बना लेते हैं।

पर भीतर,

जहाँ कोई श्रोता नहीं,
कोई प्रशंसा नहीं,

वहाँ एक मौन बैठा रहता है
और पूछता है—

क्या तुम्हारे कर्म भी
तुम्हारे शब्दों की भाषा जानते हैं?

दर्पण से
मैं अनेक बार मिला हूँ,

किन्तु समय—

समय से मिलना
कुछ और ही है।

वह चेहरे नहीं देखता,
वह प्रतीक्षा करता है
कि मुखौटे थक जाएँ।

और तब

जो शेष रह जाता है,
वही परिचय होता है।

मैंने चाहा था
स्वीकृत होना,

फिर जाना—

दूसरों की स्वीकृति
एक चलायमान छाया है।

आज प्रश्न केवल इतना है—

क्या मैंअपनी ही दृष्टि में
अपरिचित तो नहीं?

यदि भीतर का मनुष्य
बचा रहे,

तो शायद
बाहरी पराजय भी
पराजय नहीं होती।

और यदि वही खो जाए,

तो सारी उपलब्धियाँ
एक रिक्त प्रतिध्वनि भर हैं।

इसलिए अब

मैं संसार को नहीं,
स्वयं को सुनने का प्रयास करता हूँ।

क्योंकि अंततः

मनुष्य की सबसे कठिन यात्रा
भीड़ से होकर नहीं,

अपने ही सम्मुख
निर्वस्त्र खड़े होने तक जाती है।

 
6 दिन पहले
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