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"अपने ही भीतर का अपरिचित"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी-कभी
        
                                                    
                            
मुझे लगता है
मैं अपने ही मन की
अतल सुरंगों में भटकता
एक अनाम यात्री हूँ—
जिसे दिशा से अधिक
अपने प्रश्नों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

लोग कहते हैं—
जीवन सरल है,
पर मेरे भीतर
हर साधारण क्षण भी
अर्थ की किसी गहरी परत में उतर जाता है।
मैं शब्द सुनता नहीं,
उनके पीछे छिपे मौन को पढ़ने लगता हूँ।

धीरे-धीरे
मैंने स्वयं को
भीड़ से नहीं,
अपने ही स्पर्श से दूर कर लिया।
अब संवाद भी
मानो अधूरी सीढ़ियाँ हैं,
जहाँ मैं पहुँचता तो हूँ,
पर कोई अर्थ साथ नहीं पहुँचता।

मैं समझाना चाहता हूँ
अपने भीतर का वह उलझा हुआ आकाश,
पर भाषा
हर बार छोटी पड़ जाती है।
जो बात आँखों में काँपती रहती है,
वह होंठों तक आते-आते
एक थकी हुई चुप्पी बन जाती है।

और फिर—
सब ठीक करने की अधीर इच्छा में
मैं और अधिक बिखेर देता हूँ स्वयं को।
जैसे कोई
टूटे दर्पण को जोड़ते-जोड़ते
अपने ही हाथ लहूलुहान कर ले।

रातें
मेरे भीतर सबसे अधिक जागती हैं।
भविष्य की अनिश्चित छाया
तकिए के पास बैठी रहती है,
और मैं सोचता रहता हूँ—
क्या मनुष्य सचमुच
अपने प्रश्नों से कभी मुक्त हो पाता है,
या जीवन भर
उन्हीं में स्वयं को खोजता रहता है?
एक दिन पहले
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