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एक मुद्दत के बाद...

Pandit Chandradutt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक मुद्दत के बाद...,
        
                                                    
                            
आज खोली है फिर डायरी।
शायरी के साथ लिखा था जो खत,
आज अचानक मिल गया,
बड़ी शिद्दत से उसे मैने खोला।
पढ़ते ही पढ़ते उसका चेहरा उभर आया,
देखते देखते वह सामने प्रकट हो गईं,
और बोली - क्या पढ़ रहे हो?
मेरी याद ताजा कर रहे हो।
मैं कहीं नहीं हूं ? तुम्हारे पास हूं,
मैं कुछ कह पाता,
वह ओझल हो गई।
मुझे पता है! वह कहीं नहीं है?
कहीं नहीं है...?
-चंद्र दत्त शर्मा
एक दिन पहले
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