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वो बचपन के दिन

P R Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन का भी क्या समय था
        
                                                    
                            
न खाने की चिंता न समय की फ़िक्र
बस खेल ही खेल में बीतता था समय
कभी बारिश में भीगना पानी में छपाक से चलना
कागज़ की नाव पानी में तैराना
उसमें चींटे या मेंढक के बच्चे को बैठाना
बाग़ में फूलों के पंखुड़ियों को छूना
तितली के पीछे पीछे भागना
चांदनी रात में छुपन छुपाई खेलना
खाट पर बाहर सोते बच्चे की
सियाही से दाढ़ी मूंछ बना देना
वो हंसी वो ठिठोली वो प्यारे हमजोली
नीले आकाश में उड़ते पंछियों को देखना
बालू के ढेर में चिकने पत्थर खोजना
पेड़ों की सरसराहट को महसूस करना
कोयल की कूक की नक़ल करना
छोटी छोटी चीज़ों में ख़ुशी ढूंढ लेना
जब बड़े हुए तो सब ख़ुशी खो गयी
समय का अभाव व्यस्तता ही जीवन हो गया
बचपन का खालीपन विचारों से भर गया
अब हर वस्तु में उपयोगिता खोजते हैं
जीवन की भाग दौड़ में फुर्सत खो गयी
जीवन हमारे सामने है पर हम ही खो गए
उम्र बढ़ी तो दुनिया बड़ी होती गयी
छोटी छोटी चीज़ों की ख़ुशी न जाने कहाँ खो गयी
बचपन को फिर से लौट आने दो
मिट्टी पर पड़ती बारिश की खुशबू
सुबह की सुनहरी धूप, चिड़ियों की कहकह
कभी शांत शाम को रात में ढलते देखो
आकाश में दूर दूर तक चाँद सितारे निहारो
यही है भीतर के बच्चे को जगाना
फिर से बचपन को जीवित करना
एक महीने पहले
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